(१) शास्त्रों के अनुसार भारतीय शिक्षा व्यवस्था का निर्वाह

भारतीय शिक्षा के इतिहास में तक्षशिला-नालंदा जैसी विद्यापीठ के नाम प्रसिद्ध है। यह विद्यापीठ विद्याभवन, ग्रंथालय, निवास, भोजन जैसी व्यवस्थाओं में समृद्ध थे। यह सभी व्यवस्था राज्य और समाज के द्वारा होती थी। समाज और राज्य के द्वारा विद्यापीठ का योगक्षेम चलता था, तथापि समग्र योजना का सूत्र संचालन आचार्य के हाथ में ही हो यह भारतीय शिक्षा व्यवस्था की एक विशेषता रही है। समाज और राज्य के द्वारा योगक्षेम की व्यवस्था करने पर भी विद्यापीठ स्वायत्त होते थे।
इस प्रकार समाज की स्वीकृति एवं अनुदान से चलने वाली विद्यापीठ से शिक्षा प्राप्त करने वाला छात्र समाज और राष्ट्र की उन्नति हेतु कार्य करता है।

(२) विद्यापीठ अनुदान क्यों स्वीकार कर रहा हैं?

विद्यापीठ में छात्रगण एवं आचार्य गण के लिए भोजन, पुस्तक, वस्त्र एवं अन्य प्रचार-प्रसार हेतु विविध प्रकार के कार्यक्रमों के लिए धन की आवश्यकता रहती है। पढ़ने वाले छात्र और पढ़ाने वाले आचार्य इन दोनों की आवश्यकताओं की पूर्ति तो होनी ही चाहिए। भारतीय परंपरा में इन आवश्यकता की पूर्ति करने का दायित्व समाज का माना गया है।
अध्ययन-अध्यापन यह केवल किसी एक व्यक्ति की आवश्यकता नहीं हो सकती यह पूरे समाज की आवश्यकता है।
यदि समाज को सर्वतोमुखी विकास चाहिए तो उसे ज्ञाननिष्ठ बनना चाहिए, इसलिए अध्ययन-अध्यापन करने वाले छात्र एवं आचार्य के योगक्षेम की चिंता समाज करें यही इष्ट है।
भारतीय परंपरा में समाज द्वारा ही ऐसे विद्यापीठ का पोषण होता था, एसे वास्तविक उदाहरण हमें इतिहास में देखने को मिलते हैं।
ऐसी समाज सेवा की भावना से चलने वाले विद्यापीठ के निर्वाह हेतु समाज की सहभागिता से छात्रों को ज्ञान प्राप्ति का अधिकार प्राप्त होगा।


(३) अधिक अनुदान की आवश्यकता

• भारतीय शिक्षा का लाभ ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सके।
• विविध कार्यक्रमों के द्वारा भारतीय शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु।
• समग्र भारत में ऐसे नए विद्यापीठ शुरू करने में सहयोग कर सके।

• आचार्यगण का योग्य सन्मान हो।
• छात्रों को और ज्यादा सुलभ व्यवस्था दे सके।

• अनुसंधान के व्यय हेतु।
• आजीवन विद्यापीठ व्यवस्था का लाभ सभी को मिलता रहे।
• कुदरती आपदा के समय विद्यापीठ व्यवस्था में आर्थिक समस्या न हो।
• छात्रों के समग्रलक्षी विकास के लिए प्रवास हेतु।

(४) वर्तमान व्यवस्था में व्यय

• अभ्यासक्रम निर्माण हेतु।
• विद्वानों के आदर सत्कार हेतु।
• सात्त्विक आहार हेतु।
• तजज्ञ आचार्यों के सम्मान के लिए।
• विद्यापीठ की गोशाला के निर्वाह के लिए।
• ग्रंथालय के हेतु।
• अतिथि सत्कार के लिए।
• छात्र एवं आचार्य के निवास के लिए।
• शिक्षा के लिए पुस्तक एवं अन्य सामग्री हेतु।
• वर्तमान व्यवस्था में ७० छात्रों के लिए १८ श्रेष्ठ आचार्यगण शिक्षा प्रदान कर रहे है।
• उपरोक्त सभी प्रकार के व्यय को ध्यान में रखें तो वर्तमान व्यवस्था के आधार पर एक छात्र का अंदाजित वार्षिक व्यय १,५०,००० जितना होता है।

विद्यापीठ में अनुदान का स्वीकार

भारत में प्राचीन काल से सेवा का गौरव बढ़ता ही रहा है। सेवा अर्थात् -  ' स्वस्मै स्वल्पं, समजाय सर्वस्वम्।'   (स्वयं के लिए स्वल्प और समाज के लिए सर्वस्व)

अतः सेवा मे समग्र विश्व के उत्कर्ष के लिए स्वयं के पास जो कुछ भी है उसे दान करने की सद्भावना रहती है।

इस तर्क को गहराई से देखें तो स्वयं के पास रहा हुआ ज्ञान निस्वार्थ भाव से छात्रों में संक्रांत करना वह भी एक सेवा है।

ऐसी सेवा भारत के विविध विद्यापीठों में आज भी होती है।

आचार्य को छात्र के समग्रलक्षी विकास हेतु विद्यापीठ संचालन के लिए साधन सामग्री की आवश्यकता रहती है, अतः समाज के सहयोग के बिना इतना बड़ा पुण्य कार्य सफल नहीं हो सकता विद्यापीठ की आर्थिक व्यवस्था को संभालने का दायित्व सद्भावना वाले समाज का ही है।

समाज ही ऐसे क्षेत्र को पोषित करता है अतः समाज से अनुदान स्वीकारने का धार्मिक अधिकार विद्यापीठ को स्वयं सिद्ध है। गुरुकुल परंपरा में ऐसी प्रवृत्ति सहज और आवश्यक है।

गोतीर्थ विद्यापीठ समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए कार्य कर रहा है अत: हमारा दायित्व बनता है कि, हम इस भगीरथ कार्य में तन, मन और धन से जुड़ जाए।

शास्त्रों में विविध प्रकार के दानों का महत्त्व बताया गया है उसमें से विद्यादान को सर्वश्रेष्ठ माना गया है इस सत्कार्य में आपका स्वागत है। 

गोतीर्थ विद्यापीठ के आचार्य एवं विद्यार्थी द्वारा संचालित गोशाला के लिए अनुदान:-

गोतीर्थ विद्यापीठ का मुख्य लक्ष्य गोपालन

गोमाता हमारे सांस्कृतिक जीवन का केंद्र बिंदु होने के कारण गोपालन विषय अत्यंत आवश्यक है,अतः गोतीर्थ विद्यापीठ का मुख्य लक्ष्य गोपालन रखा गया।
इस विद्यापीठ के साथ जुड़े हुए सभी विद्यार्थी गण एवं आचार्य गण देसी गोमाता का महत्व जानकर गोसेवा एवं गोसंवर्धन में लगे हुए हैं।

• गोमाता द्वारा प्राप्त गव्य के बिना मनुष्य का जीवन स्वस्थ,सात्विक और धार्मिक नहीं बन सकता।
• गोमाता के गव्य के बिना यज्ञ संपन्न नहीं कर सकते।
• गोमाता के गोबर एवं गोमूत्र बिना खाद निर्माण नहीं हो सकता।
• गोमाता के बिना आयुर्वेद चिकित्सा संभव नहीं है।
उपरोक्त बिंदुओं को ध्यान में रखकर गोतीर्थ विद्यापीठ के अभ्यासक्रम का निर्माण गोमाता को केन्द्र में रखकर किया जाता है और समग्र भारत में गोमाता की सेवा कर सके ऐसे छात्रों को निर्माण करने का प्रयास होता है।

गोसेवा के कारण गोतीर्थ विद्यापीठ के छात्रों में दिखा परिवर्तन

• प्रत्येक छात्रों के मनमे गोमाता के प्रति आदर भाव एवं सम्मान बहुत ही बढ़ गया है।
• गोमाता के सानिध्य में सेवा का अवसर प्राप्त करने की तत्परता हर एक छात्र में दिखती है।

• निवासी छात्र ब्रह्ममुहूर्त में गोमाता का दोहन से गोसेवा का प्रारंभ करते हैं। गोशाला की स्वछता आदि कार्य का दायित्व स्वयं छात्रों ने ही स्वीकार किया है।
• गोसेवा की रुचि के कारण किसी भी छात्र को सुबह जल्दी उठाने का प्रयास नहीं करना पड़ता।
• गोशाला की स्वच्छता करने से छात्रों में किसी भी प्रकार का छोटे से छोटा कार्य करने का संकोच नहीं होता और रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ती है।
• गोमाता को अपने परिवार के सदस्य कि जैसे ही मानने लगे हैं।
• गोमाता के भोजन के लिए घास आदि व्यवस्था करने में उत्साह पूर्वक भाग लेते हैं।

• यज्ञ कार्य के लिए गोबर से उपले एवं दूध से घी निर्माण खुद ही करते हैं।
• सात्विक भोजन के लिए दूध,दही,छाछ, मक्खन एवं बिलोने से घी बनाने की संपूर्ण प्रक्रिया छात्र बहुत ही आनंद के साथ करते हैं।
• सात्विक भोजन में देसी गोमाता के गव्य के कारण आध्यात्मिकता का भाव बढ़ा है।

• शारीरिक,मानसिक,बौद्धिक एवं आध्यात्मिक विकास प्रत्यक्ष गोसेवा से संभव हो रहा है।

गोशाला के लिए अनुदान

हमारी भारतीय परंपरा में विश्व में कार्यरत अस्तित्व के सनातन कई सिद्धांतों को जीवन का हिस्सा बनाकर अपने और अपने परिवार के कल्याण के लिये प्रयोजित करने का मार्गदर्शन है।

परिवार के कल्याण के लिये और अपने कुल के उद्धार के लिये अपनी आमदनी में से दशांश निकालने का विधान है। दशांश हमारी आमदनी का दसवां हिस्सा होता है

भारतीय शास्त्रों के अनुसार धर्म कार्य के लिए दशांश देना हमारा प्राथमिक भाव और कर्तव्य होना चाहिये । भारतीय देसी गोमाता एक दिव्य ईश्वरीय सात्विक जीव है। इस संसार में हमारे कल्याण हेतु पूज्य गोमाता का इस धरती पर अवतरण हुआ है।

आइए हम मिलकर अपनी योग्यता और पूर्ण श्रद्धा से गोमाता की सेवा में अपना अनुदान दे और उनसे प्रार्थना करे की हमारे और हमारे पूर्वजो द्वारा जाने-अनजाने में हुए अप्रशंशनीय कर्मों को क्षमा प्रदान करे।

हमें स्मरण रहना चाहिए की गोमाता हमारी गुरुमाता है और उनसे की गई प्रार्थना परमात्मा तक पहुंचती है।

गोतीर्थ विद्यापीठ के सान्निध्य में चल रही गोशाला जिसका संचालन विद्यापीठ के आचार्य एवं छात्रों द्वारा हो रहा है।

इस गोशाला द्वारा पाये गए प्रसाद स्वरूप दुध, दहीं, छाश, मख्खन एवं घी इत्यादि का उपयोग गुरुकुल के आचार्यगण, छात्रगण और अन्य विद्यापीठ के सहयोगीजन द्वारा उपयोग में लिया जाता है।

गोमाता की सेवा के लिए मासिक एवं वार्षिक अनुदान आप की इच्छा अनुसार कर सकते हे।


A/C Name : Go Tirth Vidhyapeeth

A/C No. : 60257804354

Bank Name : Bank of Maharashtra

Branch Address : 01516 Satellite, Sachet IV, Prernatirth Road,  Jodhpur, Satellite, Ahmedabad 380015.

IFSC Code : MAHB0001516

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पता

बंसी गीर गोशाला
शान्तिपुरा चौकड़ी के पास
मेट्रो मोल की गली में,
सरखेज कर्णावती,अहमदाबाद,पिन:- ३८२२१०